
लोकसभा में बीजेपी को मिले जनादेश से एक बात तो
साफ ही थी कि मोदी उम्मीदों का आईना बनकर केंद्र में आए लेकिन समझ से परे है कि
जनता इतनी जल्दी उतावली क्यों हो रही है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में रातों-रात
तो स्थितियां नहीं बदल सकतीं। कुछ वक्त तो
लगना स्वाभाविक बात है या फिर हम ये समझे कि मोदी के हाथ में अलादीन का चिराग या
फिर जादू की छड़ी है? क्या हम ये मानने को तैयार है?
नई सरकार को कांग्रेस की गलतियों की सजा कुछ तो
भुगतनी ही पड़ेगी। जब देश ने 10 सालों के
कांग्रेस के शासन काल को झेल लिया तो कुछ वक्त तो इस सरकार को भी देना जरूरी है। बढ़ाए गए रेल किराए से भारतीय रेल को 8000 करोड़
का फायदा होगा जोकि अब तक घाटे के साए से गुजर रही है।
जाहिर सी बात है कि होने वाले इस मुनाफे से रेल
यात्रियों को सारी सुविधाए मुहैया कराईं जाएंगीं, लेकिन कुछ वक्त तो लगेगा। रेल किराए में बढ़ोत्तरी भी इसी सोच से की गई
है! लेकिन लोग इस पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता
नहीं समझ रहे, बस मौका मिला और शुरू हो गए।
अगर इस तरह अभी से सरकार का मनोबल गिराने में जुट जाएंगे तो शायद आने वाले
वक्त में हम सपनों के आइने में देश के विकास की तस्वीर देखने से वंचित रह जाएं। सरकार बनने के अगर कुछ महीनों बाद जनता का ये
रूख दिखता तो लाजिमी था, लेकिन सिर्फ एक महीने में ही इस तरह का आक्रोश समझ से परे
है..........
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