चौंकाने वाला विरोध

देश की सत्ता बदल चुकी है, एक नई सरकार से जनता मुखातिब है और नई सरकार के कार्यकाल को एक महीना पूरा हो चुका है। नई सरकार यानि मोदी से उम्मीदें लगाए बैठी जनता ने अपना उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है, कारण है रेल किराए में हुई बढ़ोत्तरी और गैस के दामों में बढ़ोत्तरी की संभावना।  रेल किराए के बढ़े दामों पर विपक्ष ने मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया।  सियासी तेवरों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है।  विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए लेकिन इससे ज्यादा आश्चर्य की बात ये है कि जो जनता चुनाव के वक्त या यूं कहें हमेशा से मोदी की शान में कसीदे गढ़ती रही वही अब विरोध करनें में भी आगे आ रही है। 
                                               लोकसभा में बीजेपी को मिले जनादेश से एक बात तो साफ ही थी कि मोदी उम्मीदों का आईना बनकर केंद्र में आए लेकिन समझ से परे है कि जनता इतनी जल्दी उतावली क्यों हो रही है।  सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में रातों-रात तो स्थितियां नहीं बदल सकतीं।  कुछ वक्त तो लगना स्वाभाविक बात है या फिर हम ये समझे कि मोदी के हाथ में अलादीन का चिराग या फिर जादू की छड़ी है? क्या हम ये मानने को तैयार है नई सरकार को कांग्रेस की गलतियों की सजा कुछ तो भुगतनी ही पड़ेगी।  जब देश ने 10 सालों के कांग्रेस के शासन काल को झेल लिया तो कुछ वक्त तो इस सरकार को भी देना जरूरी है।  बढ़ाए गए रेल किराए से भारतीय रेल को 8000 करोड़ का फायदा होगा जोकि अब तक घाटे के साए से गुजर रही है।  
                 जाहिर सी बात है कि होने वाले इस मुनाफे से रेल यात्रियों को सारी सुविधाए मुहैया कराईं जाएंगीं, लेकिन कुछ वक्त तो लगेगा।  रेल किराए में बढ़ोत्तरी भी इसी सोच से की गई है! लेकिन लोग इस पहलू पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझ रहे, बस मौका मिला और शुरू हो गए।  अगर इस तरह अभी से सरकार का मनोबल गिराने में जुट जाएंगे तो शायद आने वाले वक्त में हम सपनों के आइने में देश के विकास की तस्वीर देखने से वंचित रह जाएं।  सरकार बनने के अगर कुछ महीनों बाद जनता का ये रूख दिखता तो लाजिमी था, लेकिन सिर्फ एक महीने में ही इस तरह का आक्रोश समझ से परे है..........       

अब वक्त है बदलाव का





अद्द्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय...  आखिर लोकतंत्र की जीत में ये तीनों ही विस्मयादिबोधक शब्द शामिल हो गए। 16वीं लोकसभा के निर्माण में जारी हुआ जनादेश चौंकाने वाला रहा। चुनावी परिणामों में भारतीय जनता पार्टी ने 282 सीटें हासिल करके न सिर्फ पहली बार पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई बल्कि पार्टी के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण वक्त अंकित कर दिया। बीजेपी के गठबंधन एनडीए ने 334 सीटें हासिल करके इतिहास रच दिया। इस बार के लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर में डुबकियां लगा कर बीजेपी ने न सिर्फ अपनी डूबती राजनीति को बचाया बल्कि विपक्षियों के मुंह पर एक जोरदार तमाचा लगाया।  इस बार के चुनाव में जनता ने प्रत्याशियों को नहीं बल्कि पार्टी को वोट दिया और वो भी मोदी के नाम पर। ये मोदी के नाम का ही असर है जो पहली बार देश के युवा राजनीति में जोरदार दिलचस्पी दिखा रहे हैं। शुरूआत में मोदी के नाम से शुरू होकर राजनीतिक गलियारों में जो हलचल मची थी, वो देखते ही देखते सुनामी में बदल गई। एक ऐसी सुनामी जिसके फेर में पड़ कर  सभी दल तबाह हो गए। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेेस का तो 20 राज्यों से बिल्कुल सफाया ही हो गया तो वहीं देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में प्रभुत्वशाली सपा और बसपा की जड़ेें हिल गईं। सपा सिर्फ अपने गढ़ोंं में इज्जत बचा पाई और सिर्फ 5 सीटें हासिल कर पाई तो बसपा का राजनीतिक भविष्य अंधेरे में ही पड़ गयाू। किसी जमाने में दलित-ब्राम्हण समीकरण से यूपी में भरपूर चमक पैदा करने वाली मायावती की इस पार्टी का तो सूपड़ा ही साफ हो गया।  एक भी सीट नहीं मिली इस पार्टी को।
              फिलहाल इस बार के जनादेश से एक बात तो साफ है कि देश की जनता ने देश की राजनीति को बदल डालने का फैसला कर लिया है। कांग्रेस की हुई दुर्गति से साफ है कि जनता किस कदर त्रस्त हो चुकी थी।  अब वक्त है बदलाव का। वक्त है देश की तरक्की का। देश की हर आंख लगी हुई हैं नरेंद्र मोदी जी पर।  अच्छे दिन आने वाले हैैं......

लोकतंत्र का फैसला आज

आखिर वो दिन आ ही गया जिसका पूरे देश को बेसब्री से इंतजार था।  लोकतंत्र के हर नुमाइंदे को, हर रखवाले को और देश के हर उस नागरिक को जिसने लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लिया था।  आज शाम तक चुनावी नतीजे घोषित हो जाएंगे और साथ ही हो जाएगा देश के भाग्यविधाता का फैसला।  किसके भाषणों में कितना दम था और कौन उतरा अपनी उम्मीदों पर खरा ये खुल कर आ जाएगा आज।   वाकई आज लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन है और हो भी क्यों न आखिर चुनाव आयोग ने कितने ही जतन अपनाएं इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए।  अरे चुनाव आयोग ने ही क्यों हर सफेद पोशाकधारी ने ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था आज के दिन के लिए।  ईवीएम में बंद प्रत्याशियों की किस्मत आज अपना खेल दिखाएगी, किसी को हंसाएगी तो किसी को रुलाएगी।   वेैसे इस बार के अनुमानित चुनावी आंकड़े बीजेपी के पक्ष में गूंज रहे हैं।  और इसकी सबसे बड़ी वजह है 'मोदी की लहर'।  इस बार बीजेपी मोदी की लहर में खूब डुबकियां लगा रही है। सियासी आंकड़े जो भी आएं लेकिन मोदी की हवा तो तीखी दिख रही है और ये बात भी साफ है कि कुछ रणनीतियां तो बेहद मजबूत हैं।  फिलहाल शाम तक पता चल ही जाएगा कि कौन अपनी किस्मत पर इतराएगा और कौन रोएगा अपनी किस्मत पर।   मिलते हैं आज शाम को चुनावी नतीजों के साथ......

राजनीतिक हथकंडा: मोदी मुद्दा

सियासी महासागर अपने उफान पर है।  छह चरणों का चुनाव पूरा हो चुका है।  कुछ चरण बचे हैं साथ ही चुनावी नतीजों की तारीख नजदीक आ रही है।  सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ इनके नेताओं की धड़कनें बढ़ रहीं है।  हालांकि धड़कनें बढना लाजिमी है, आखिर नेताओं का भविष्य जो तय करेेंगे ये नतीजे।  कोई सांसद बन कर अपने भाग्य पर इठलाएगा तो कोई हार का मुंह देख कर अपनी किस्मत को कोसेगा।  अब सियासत में तो रोना- हंसना बना ही रहता है और वैसे भी सियासत में भगवान सबको तो खुश नहीं रख सकते।
            इस चुनावी माहौल में आज-कल नेताओं की जुबान पर सिर्फ एक मुद्दा है। ये मुद्दा न तो विकास का है, न बेरोजगारी का और न ही महंगाई का। ये मुद्दा है 'मोदी का मुद्दा' ।  इसमें अतिशयोक्ति न होगी कि इस वक्त नेताओं की जुबान पर मोदी के लिए कड़वे बोल हैं और चेहरे पर विस्मय के भाव।  वैसे तो राजनीतिक पार्टियों के खून में एक दूसरे की आलोचना बहा करती है लेकिन इस वक्त सिर्फ और सिर्फ मोदी पर टिप्पणियां और बयानबाजी ही बह रही है।  सबका बस एक ही इरादा है कि मोदी को पीएम नहीं बनने देंगे।  क्यों सबको मोदी से इतनी चिढ़ हो रही हैं?  सभी पार्टियां मोदी पर बयानबाजी में एक जुट नजर आ रहीं हैं।  इससे एक बात तो साफ झलकती है कि इन सबके दिल में एक डर है और वो डर हैै मोदी के प्रधानमंत्री बनने का।  आखिर क्यों ये नेता और राजनीतिक पार्टियां इतनी स्वार्थी होती जा रहीं हैं कि चुनाव के वक्त भी देश के बारे में छोड़ कर अपने विरोधी को मुद्दा बनाने में जुटीं हैैं?  ये सरासर भद्दे राजनीतिक हथकंडे है जो नहीं अपनाए जाने चाहिए......

फिल्म समीक्षा: 2 स्टेट्स


अभिषेक वर्मन निर्देशित '2 स्टेट्स' आलिया भट्ट की तीसरी और अर्जुन कपूर की चौथी फिल्म है। दोनों फिल्म खानदान से आए ताजातरीन प्रतिभाएं हैं। उन्हें इंडस्ट्री और मीडिया का जबरदस्त समर्थन हासिल है। वास्तव में दर्शकों के बीच स्वीकृति बढ़ाने के लिहाज से दोनों के लिए उचित माहौल बना दिया गया है। फिल्म देखते समय लेखक की समझ और निर्देशक की सूझबूझ से '2 स्टेट्स' अपेक्षाओं पर खरी उतरती है। साधारण होने के बावजूद फिल्म श्रेष्ठ लगती है।
                फिल्म में गानों का कोई विशेष महत्व नहीं है लेकिन हिंदी फिल्मों की परंपरा को निभाने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया है। फिल्म की कहानी पंजाबी कृष मल्होत्रा और तमिल अनन्या स्वामीनाथन की प्रेमकहानी बदले भारतीय समाज में अनेक युवा दंपतियों की कहानियों से मेल खाती है। विभिन्न प्रांतों, जातियों और संस्कृतियों के बीच हो रहे विवाहों में ऐसी समस्याओं से दिक्कतें होती हैं। फिल्म निर्देशक अभिषेक वर्मन ने फिल्म की प्रस्तुति में चमक और चकाचौंध से बचने की पूरी कोशिश की है। अभिषेक ने हीरो-हीरोइन के प्रणय में प्रचलित लटकों-झटकों को नहीं अपनाया है। अगर वे गाने ठूंसने के व्यावसायिक दबाव से बच जाते तो फिल्म की सरलता गहरी हो जाती। 
                    अर्जुन कपूर ने कृष मल्होत्रा के किरदार को संयत तरीके से निभाया है। अभी तक की तीनों फिल्मों में उन्होंने थोड़े रूखे और आक्रामक किरदारों को निभाया था। इस बार विपरीत स्वभाव की भूमिका में उन्होंने खुद को सहज रखा है। बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में उन्होंने अपना स्वर मद्धिम किया है। निश्चित ही उनके अभिनय में निखार आया है।

                    आलिया भट्ट एक बार फिर प्रभावित करती हैं। अनन्या स्वामीनाथन के किरदार को अपनी मासूमियत से वह अलग अंदाज तो देती हैं, लेकिन तमिल लड़की के रूप में वह संतुष्ट नहीं करतीं। उन्हें अपने लहजे और मुद्राओं पर ध्यान देना चाहिए था। तीसरी फिल्म में आलिया भट्ट अपनी सीमाएं भी जाहिर कर देती हैं। अभी तक दोनों फिल्मों में हम सभी ने आलिया भट्ट को देखा। पिछली दोनों फिल्मों में वह किरदारों में ढलने के बावजूद आलिया भट्ट ही रहीं, लेकिन अपने नएपन की वजह से अच्छी लगीं। '2 स्टेट्स' के नाटकीय दृश्यों में भावों की अभिव्यक्ति में वह खुद को ही दोहराती रहीं। '2 स्टेट्स' के अंतिम प्रभाव को बढ़ाने में सहयोगी कलाकारों का जबरदस्त योगदान है। अमृता सिंह, रोनित राय, शिव सुब्रमण्यम और रेवती ने माता-पिता की भूमिकाओं में अपने परिवेश और परिवार की बारीकियों को भी व्यक्त किया है। हां, फिल्म के दृश्यों के अनुकूल संवाद नहीं हैं। संवादों में अर्थ और भाव की कमी है। फिल्म की प्रस्तुति का शिल्प भी एक बाधक है। 

वाह रे समाजवाद!!

वाह रे समाजवाद!... वाह रे लोहियावाद!... वाह रे समाजवादी पार्टी!....क्या खूब कही नेताजी ने!  सैफई में फिल्मी तारिकाओं के ठुमकों पर नजरें नचाने वाले समाजवादियों की जुबान भी नाचने लगी। आखिर मुलायम सिंह यादव ने दे ही दी समाजवाद की असली परिभाषा। बेटियों की बोटियां नोचने वाले दरिंदों को समाजवाद का रखवाला बना दिया!  हैरान होने की आवश्यकता नहीं है, मुद्दा है मुलायम का शर्मनाक बयान। मुरादाबाद में एक जनसभा में  पार्टी मुखिया मुलायम सिंह ने बलात्कार के आरोपी को फांसी की सजा को गलत ठहराया। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह रही कि नेताजी ने कह डाला कि लड़कों से गलती हो जाती है और इस गलती की वजह से उसे फांसी नही दी जानी चाहिए।   आखिर  क्या यही है समाजवाद का असली रूप या फिर हैं ये सियासी बोल? क्या समाजवादी नेताओं की नज़र में  महिलाओं की अस्मत का मूल्य नहीं है?  अरे समाजवादियों  महिलाओं की अस्मत घर में रखा कोई मिट्टी का खिलौना नहीं हैं जिसे कोई बच्चा तोड़ दे तो उसे एक गलती मान लिया जाए।  महिलाओं की अस्मत की बोटी नोचने वाले दरिंदों की दरिंदगी को गलती का नाम दे दिया। वाह नेताजी वाह।   मुलायम के इस शर्मनाक बयान से तो लगता है कि नेताजी ने बलात्कारियों के वोटों को हजम करने के लिए पूरी रणनीति तैयार कर रखी है। सियासी महासमर में मुलायम के इस बलात्कारी बयान ने खलबली मचा दी। मुझे भी अब समझ में आ रहा है कि क्यों यूपी विकास की राह देख रहा है। जब सत्तापक्ष के मुखिया ही इस तरह के बयान देने में लिप्त हैं तो आप समझ सकते हैं कि इनकी सोच किस हद की होगी। क्या यही है समाजवादियों की सोच? क्या इसी सोच के साथ प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा होगी? क्या बलात्कार जैसे घिनौने अपराध को मात्र एक गलती मान लिया जाएगा? ऐसे कई सवाल हैं समाजवादियों!!!!!

वाह! क्या सड़क है!!

रे ये क्या! ये तो बिल्कुल ठीक हो गई!! कल तक तो यहां से गुज़रना मुश्किल था और आज वाह!!  उक्त विस्मयादिबोधक विचार उस वक्त मेरे दिमाग में कौंधा जब मैने एक टूटी हुई सड़क को चमकते देखा। दरअसल उस सड़क से मेरा रोज का आना जाना है। हर रोज धूल के गुबार उड़ा करते थे, चलते समय पैरों में पड़ी चरणपादुकाएं चीख-चीख कर कानपुर के बदहाल रास्तों की लाचारी बतातीं थी। और आज वही टूटी सड़क सज-संवर कर मेरे निकलने के इंतजार में पलकें बिछाए बैठी थी। तो इसी कारण मेरे दिमाग में ये विचार उपजा जो आपने ऊपर पढ़ा।
                                                      आपको बता दें कि इस वक्त ये हाल कानपुर महानगर की हर सड़क का है। कल तक जो सड़कें खस्ता हाल थीं आज चमक रहीं हैं। और चमकाने का सिलसिला चल दरअसल इसकी एकमात्र वजह है विधानसभा चुनाव 2017’ ! अभी तक अपनी बदहाली से बेहाल इन सड़कों के जल्दबाजी में नवीनीकरण और सुंदरीकरण की वजह है चुनाव को कानपुर में वोट पड़ने के बाद क्या फर्क पड़ेगा सड़के रहें या टूटें। नेताओं की झोली तो भर ही जाएगी वोटों से। अरे सड़कें जो चमका दीं!  जल्दबाजी में बनाईं गई ये सड़के वोट बैंक की राजनीति के तारकोल से बनीं हैं। अब देखना ये है कि ये तारकोल और पत्थर कब तक अपनी पकड़ बनाए रखते हैं। कब तक टिकेंगी ये सड़कें? एक बड़ा सवाल......

दुर्घटनाओं का दंश


हले से ही रक्षा बजट पर कम खर्च का दंश झेल रहे  देश को  एक छोटे से समयान्तराल में ही सुरक्षा के क्षेत्र में कई बड़ी दुर्घटनाओं से दो-चार होना पड़ा है। आठ महीने में ही लगभग दो हजार करोड़ की चपत लगी है। पहले नौसेना ने सिन्धु रक्षक पनडुब्बी को खो दिया और हाल ही में वायुसेना ने अपने  सबसे ताकतवर विमान हरक्युलिस को। इतना ही नहीं  इस विमान दुर्घटना में वायुसेना ने अपने छह जाबांज जवान खो दिए। चार विंग कमांडर और दो स्क्वाड्रन लीडर।  ये तो बात हुई दो बड़े हादसों की। इसके अलावा कई छोटे-छोटे हादसों से गुजरती रही है भारतीय सेना। इन हादसों ने एक बार फिर  देश की सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर  दिए  हैं।  एक तरफ तो रक्षा बजट पर पर्याप्त धन खर्च न कर पाने की वजह से कानाफूसी होती रहती है और ऐसे में इन हादसों ने आग में घी डालने का काम किया है।




समझा ज़िंदगी की हकीकत


चपन तो हंसते खेलते बीत गया। जब ठीक से खुद को समझना शुरू किया तब से घर से बाहर रहा।     शुरूआत में सब कुछ अच्छा लगता था। कभी जिंदगी को गंभीरता से नही लिया और लेता भी क्यों?  धीरे-धीरे जिंदगी आगे बढ़ने लगी और सामने आने लगी जिंदगी की हकीकत। कानपुर से स्नातक किया और उस वक्त तक जिंदगी को एक छोटे बच्चे की तरह ही समझता रहा। हर चमकती हुई चीज को सोना समझता रहा। न ज्यादा सपने थे और न ही कोई अरमान। न तो भविष्य की चिंता थी और न ही गुजरे वक्त का कोई ग़म।

                       फिर ज़िंदगी ने करवट लेनी शुरू की। हालातों नें अपना रंग दिखाना शुरू किया और आने लगा बदलाव। बदलाव मुझमें, मेरे विचारों में और जिंदगी के प्रति मेरे नज़रिए में। पत्रकारिता के अध्ययन ने मुझे जीवन के दूसरे पहलू से अवगत कराना शुरू किया और आज भी हर दिन कुछ नए विचारों से आमना-सामना होता है।
                      किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखल नहीं देना चाहिए चाहे वो आप के कितने ही करीब क्यों न हो। हो सकता है इसका खामियाजा आप को ज़िंदगी भर भुगतना पड़े। कुछ परिस्थितियों में खुद को ढाल नहीं पाया और आज पछता रहा हूं। गलती मेरी भी नहीं थी, जिस चीज की आपको उम्मीद न हो और वो हासिल हो जाए तो हम भटक जाते हैं। आखिर हम इंसान ही तो है। ज्यादा खुशी बर्दाश्त नहीं हुई और भटक गया जिसका मलाल मुझे आज भी है। किसी के वादों की नींव पर सपनों के महल तैयार किए थे। लेकिन तालमेल की कमी के एक छोटे से तूफान नें सारे महलों को गिरा दिया। शायद ये सपनों के महल कुछ कमजोर थे।
                             वादों से मिली खुशी के पंखों से उड़ान भरने लगा था। उड़ान जो बहुत दूर तक जाने वाली थी। लेकिन अफसोस! हालातों ने पंख तोड़ दिए और मैं सपनों के उस नीले आसमां से नीचे आ गिरा। गिरा आकर टूटे विश्वास की ज़मीन पर जो मेरे लिए बेहद पथरीली हो चुकी थी, बेहद सख्त। गिरने से मेरे अरमानों का पूरा बदन चोटिल हो गया और आज भी उस दर्द का अहसास हो रहा है।
                             
उन महलों को बनाने और पंखों को फिर जोड़ने में प्रयासरत हूं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही। साथ ही अब जिंदगी को संवारने के प्रयास शुरू कर दिए हैं और सफलता भी मिलने लगी है, इन प्रयासों में। खुद पर पूरा विश्वास है कि एक दिन सफलता की उस ऊंचाई पर जाऊंगा जहां मुझे देखने के लिए लोगों को अपने सिर बहुत ऊपर उठाने पड़ेंगे। अब सोचता हूं कि एक महल के गिरने से ज़रूरी तो नहीं कि इंसान बेघर हो जाए। सोचता हूं कि इन गिरे हुए सपनों के महलों को हमेशा के लिए नष्ट कर दूं। अगर ज़िंदगी ने चाहा तो फिर नए सपनों को सजाऊंगा। फिर भरूंगा उड़ान जो होगी मजबूत पंखों की, जो ले जाएगी मुझे बहुत ऊपर।   

प्रेम की शक्ति


प्रेम इस मोहमाया से परिपूर्ण संसार की सबसे बड़ी ताकत है। किसी भी प्राणी से बलपूर्वक कार्य सम्पन्न कराने की अपेक्षा करना भी पाप है।  प्रेम के माध्यम से किसी भी जीव के हृदय एक भावनात्मक दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सकता है।  ये प्रेम ही है जो कठोर हृदय प्राणी को भी उदार बना देता है।  संवेदना, भावना और मनोभाव की पराकाष्ठा ही तो है प्रेम।  प्रेम भावना ही किसी प्राणी के विनम्र स्वभाव की परिचायक है। 


                                      

                     
                                                 प्रेम ही ऐसी महान शक्ति है जो सभी दिशाओं में जीवन को आगे बढाने में सहायक होती है। बिना प्रेम के किसी के विचारों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। विचार तर्क-वितर्क की शक्ति नहीं है। विचारणा एवं विश्वास बहुकाल के सत्संग से बनते हैं। अधिक समय की संगति का ही परिणाम प्रेम है। इसलिए विचार धारणा अथवा विश्वास प्रेम का विषय है। यदि हम दूसरों पर विजय प्राप्त करके उनको अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं, उनके दृष्टिकोण को बदलकर अपनी बात में सहमति चाहते हैं तो प्रेम का ही सहारा लेना चाहिए। विश्वास रखिए कि आपकी प्रेम और सहानुभूति से परिपूर्ण बातों को सुनने के लिए दुनियां विवश हो जाएगी। बस धैर्य रखिए।

औरत होने की सज़ा


इस लेख में 'औरत' से मेरा तात्पर्य अविवाहित तथा विवाहित दोनों से है। इसलिए भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है.....

         "औरत" भगवान की एक अप्रतिम रचना जिसके कई रूप हैं। एक मां, बहन और पत्नी  के रूप में औरत सदियों से अपनी परम्परा निभाती चली आ रही है। लेकिन क्या आज के समाज में औरत सुरक्षित है? यह एक बड़ा सवाल है, हर इंसान के सामनें। औरतों पर दिनों-दिन हो रहे अत्याचार इस बात का सबूत हैं कि बेरहमी किस कदर औरत पर हावी होती जा रही है। बलात्कार, दहेज हत्या, मानसिक प्रताड़ना और ना जाने कितने तरह के शोषणों से दो-चार होती है ये 'औरत'। जाने कितनी नजरे उठतीं हैं और उन नजरों में होती है हवस की ज्वाला। कितनी ही बातें, गन्दी टिप्पणीं और अभद्र व्यवहार सुनने और सहने को मिलता है इस औरत को। छेड़छाड़ को बर्दाश्त करना तो आदत में शामिल हो चुका है। आखिर हम किस तरह के समाज का निर्माण करते जा रहे हैं? हम या कोई और? क्यों हम क्यों नहीं? आखिर हम भी तो इस समाज का ही एक हिस्सा हैं और यहां हो रही अच्छी बुरी हर घटना के हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितना कि घटना को अंजाम देने वाला। आखिर क्यों इंसानियत मरती जा रही है? क्यों इंसानी रूहों में दरिंदगी पनप रही है? क्यों हमारी उस नजर की रोशनी कम होती जा रही है जिसमें औरत के लिए सम्मान हो? क्या यह सब उस देवी के लिए औरत होने की सजा है या फिर श्राप? हमें खुद से पूछना होगा और तलाशना होगा समाधान। ताकि हर औरत सुरक्षित होकर घूम सके और कर सके अपने जीवन का निर्वाह। 


                                आवश्यकता है उस दृष्टिकोण की जिसमें औरत को देवी समझा जाए, जिसके वह योग्य है।       

आधुनिक हो रहे भगवान!

भगवान के संदर्भ में लिखने से पहले इस बात पर ध्यान देना होता है, कि कहीं इस आर्टिकल से किसी समुदाय के व्यक्तियों की भावना आहत ना हो जाए, इसलिए शब्दों का सद्उपयोग बहुत जरूरी हो जाता है। बात आधुनिक होते भगवान की है तो आज शिरड़ी में सोने के सिंहासन पर सोने का मुकुट लगाए बैठे प्रभु ने अपने जीवनकाल में कभी किसी भौतिक वस्तु का लोभ नहीं किया पर आज का युग आधुनिक है तो प्रभु भी भौतिकवाद से परिपूर्ण हो रहे हैं। भगवान को ये आधुनिकता किसी और ने नहीं बल्कि उनके ही द्वारा रचित इंसान ने दी है। सिर्फ शिरड़ी ही नहीं वाराणसी,उज्जैन,ऋषिकेश,कोटा कुल्लू हर जगह आज भगवान आधुनिक होते जा रहे हैं। ये वो ही भगवान हैं जो अपने सम्पूर्ण जीवन में सिर्फ मनुष्य हित में जिये हैं, पर आज के बदले दौर में भगवान हो रहे हैं आधुनिक। पिछले वर्ष आई फिल्म ‘ओह माई गाड’ में तो निर्देशक ने साफ-साफ भगवान का एक अविस्मरणीय रुप दिखाया था। सूट में श्रीकृष्ण की कल्पना मनुष्य शायद ही करता हो, फिल्म ने बताया कि भगवान एक ही वस्त्र(कपड़े) कितने दिन पहनेंगे, जब हम रोज नए डिजाइनर कपड़े पहनते हैं, तो वो तो भगवान हैं। जब हम पत्र से टेलीफोन फिर मोबाइल फिर इंटरनेट तक आ पहुँचे तो भगवान अपने शस्त्र कंधे पर रखे क्यों घुमें वो भी हाइटेक जमाने के भगवान हैं।
       बात यहीं खत्म नहीं होती आधुनिक भगवान का फायदा कुछ ढोंगी खूब मज़े से उठाते हैं। कोई हाथ हिला के "कल्याण होगा" का आर्शीवाद दे रहा है तो कोई गा कर भक्तों तक अपनी झूठी कृपा पहुँचाकर भक्तों के धन को लूट रहा है। भगवान अब मनोरजंन का साधन बन चुके हैं, कोई 3-डी में उतारकर इन्हें बेच रहा है तो कोई अच्छी-अच्छी इमारतों में रख कर भगवान की कृपा बता कर खुद पर कृपा बरसा रहा है। यही नहीं अब तो त्योंहारों पर भगवान को आधुनिकता के शहद में डुबों कर रुपये रूपी मधुमक्खी को इनके पास आने पर मजबूर किया जाता है, जो भगवान जितना ज्यादा आधुनिक उतनी अधिक कीमत।
                            भगवान के नाम पर धंधा करने वाले अब भगवान पर अपना इस कदर हक जमाते जा रहे हैं कि भगवान पर कापीराइट भी लेने लग गए हैं, मतलब इन भगवान पर मेरा अधिकार है, कोई दूसरा नहीं इस्तेमाल कर सकता। लोगों ने ये हाइटेक भगवान अपनी कल्पना से बनाए हैं। अगर ऐसा रहा तो आने वाले समय में हमें धनुष-बाण की जगह बंदूक-गोली से युक्त और शरीर पर दो वस्त्रों की जगह टाई-सूट वाले भगवान की पूजा करनी होगी! क्या फिर हम फेसबुक पर टाई-सूट पहने बंदूक लिए चूहे या मोर पर नहीं बल्कि मर्सिडीज या प्लेन पर बैठे भगवान की पिक्चर को लाइक करेंगे? अगर भगवान आधुनिक होंगे तो क्या उन पर लिखे गये ग्रंथ जैसे – गीता,कुरान,बाइबिल आदि हमें किताबों की शक्ल में नहीं नोटपैड,आईपैड के रुप में पढ़ने को मिलेंगे?
इस हाईटेक जमाने की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में भगवान क्या खुद को पिछड़ा महसूस कर रहे हैं,क्या वो भी खुद को अपडेट रखना चाहते हैं और वो भी आधुनिकता के रंग में रंग रहे हैं? हम एक नई विचार धारा बना कर भगवान के आधुनिक रुप की कल्पना जरुर कर सकते हैं।

 

सोशल मीडिया का क्रेज


                               
 

 
एक दौर था जब बैलगाढ़ी से प्रचार होता था लेकिन अब जमाना हाईटेक हो गया है। अब जमाने के साथ प्रचार भी हाईटेक है। जन के जेहन में पहुंचने के लिए राजनीति दल कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। होर्डिंग से लेकर रैलियां और भाषण सब हाईटेक हो गया है। आजकल नेता जन से संपर्क करने के लिए घर-घर जाकर चप्पलें घिसना नहीं चाहते वो घर बैठे सोशल साइट से अपने विचारों और वादों का आदान प्रदान करने लगे हैं। ये तरीका आसान तो हैं लेकिन सत्ता कतई नहीं 2014 के लोकसभा चुनावों में किस कदर प्रचार के इस आधुनिक तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक गूगल, ट्विटर और फेसबुक की आमदनी भी लोकसभा चुनाव की वजह से काफी ज्यादा बढ़ गई है। क्योंकि 2009 के मुकाबले इस बार सोशल मीडिया पर पार्टियां काफी खर्च कर रहीं हैं। ऐसोचैम की रिपोर्ट कहती है कि इस बार चुनाव की पब्लिसिटी में 400 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते हैं, और हों भी क्यों न चुनाव आयोग के एक अनुमान के मुताबिक 80 करोड़ वोटरों में 60 से 70 फीसदी वोटरों की पहुंच इंटरनेट तक जो है। यह सोशल मीडिया की ही चमक है कि अब लालू भी ट्वीट करने लगे हैं और इसकी दूसरी वजह ये है कि इस बार चुनावों में युवाओं की तादात बढ़ी है और युवाओं में इन साइट्स का खासा क्रेज है। बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हों या फिर आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल दोनों ही समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ट्विटर और फेसबुक का जमकर इस्तेमाल करते हैं। राजनीतिक दल भी चुनावी मौसम में सोशल मीडिया पर अपनी बात रखना पसंद कर रहे हैं। सोशल मीडिया से प्रचार के भले ही तमाम फायदे हों लेकिन भारतीय राजनीति में प्राचार की जो परम्परा रही है जिसमें घर-घर जाकर जन से संपर्क करना ही सही था और ये उस पर आघात है और दूसरा ये कि इससे नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरियां भी बढ़ेंगी।


                     

उम्मीदों का दांव..

नेताओं के भाषणों और वादों की नीव पर जनता ने सपनों में तरक्की के जो महल तैयार किए थे वे सियासी तूफान में लड़खड़ा कर धराशायी हो गए। विकास के जो सपने देखे थे वे सियासी अंधेरों में कहीं गुम हो गए। बात कर रहा हूं पूरे देश की जनता के अरमानों की। लेकिन जनता इंसानी भावनाओं में बह कर एक बार फिर से उम्मीदों के पुल तैयार कर चुकी है। चुनावी माहौल है और वो भी पूरे चरम पर तो फिर से शुरू हो चला है नेताओं की हां हुज़ूरी का दौर। ये चुनावी माहौल तो ईद के चांद की तरह हैं। अरे! माफ करिएगा, ईद का चांद तो साल में एक बार दिख जाता है लेकिन ये माहौल तो पांच सालों में दिखता है। नारे, भाषण और आरोप यही बह रहा है चुनावी बयार में।    क्या हमने कभी सोचा है कि आखिर क्यों ये नेता जी जान लगा देते है चुनाव जीतने के लिए? अगर हम कहें कि देश की या जनता की सेवा करने के लिए तो ये अपने साथ ही एक संवेदनात्मक व्यंग्य होगा।  इस तरह की बात इनके लिए सोचना भी इनके विचारों के साथ बेइमानी होगी। आखिर सोचें भी क्यों आज के ऐसे युग में जब एक इंसान दूसरे इंसान की मदद करने से कतराता है, और अगर करता भी है तो एक कभी न समाप्त होने वाले एहसान के रूप में। ऐसे में इन नेताओं से एक नहीं बल्कि पूरे देश की सेवा की उम्मीद करना तो दूर ऐसा सोचना भी व्यर्थ है। फिलहाल ये अपने प्रलोभनों में सफल भी होते हैं या फिर यूं कहें कि किसी न किसी को तो हमें चुनना ही पड़ता है। बस किसी की बातों और वादों से उस पर विश्वास ही किया जा सकता है उसके मन में क्या है ये कौन जाने। यही तो हम सब करते हैं। किसी एक को चुन लिया और लगा दीं सारी उम्मीदें दांव पर अब इन उम्मीदों की भरण पोषण उसी की ज़िम्मेदारी, करे या ना करे

चुनावी दौर मे नारों का माहौल


चुनाव है तो नारे भी होंगे, चुनाव जीतने के ये सहारे भी होंगे
ये बात अलग है कि इनका नहीं कोई मतलब, लेकिन इन नारों में तो ये नेता हमारे ही होंगे
                                   जीहां हम बात कर रहे हैं चुनावी नारों की जो हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियां बदल देती हैं...ऐसा नहीं है कि इन नारों से सियासत में फर्क नहीं पड़ता, पड़ता है तभी तो पार्टियों का जोर इन पर ज्यादा होता है। चंद शब्दों से बने इन नारों से संदेश देने की पहल होती है, तो विरोधियों को बेनकाब करने की कूबत।
                                   ये अजीब इत्तेफाक है कि एक स्लोगन सियासत में चार चांद लगा देता है। ताजा उदाहरण की बात करें समाजवादी पार्टी ने साइकिल उम्मीद की चलाई और विधानसभा चुनावों में 224 सीटें पाईं। बात अगर 2014 के चुनावों की करें तो युवा इस बार निर्णायक भूमिका में होंगे सो उन्हें रिझाने के लिए वैसे ही नारे गढ़े जा रहे हैं।कांग्रेस के ताजा नारे की बात करें तो इसका नारा है कट्टर सोच युवा सोच।  इसके अलावा एक और नारा आया है हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्की। बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा तो एसपी ने देश बचाओ देश बनाओ नारा दिया है। तो ये नारे है और नारों का क्या, इसलिए अपना मत उसी को दान करें जो आपकी नज़र में सियासत के लिए सही हो......